Saturday, May 7, 2011
























ज़ख़्मों पर मैं अक्सर बस आग छिडकता था
इक राख नतीज़ा है अंगारे लिखता था

क्या करूँ तुम्हारा मैं वो बोलता रहता था
तब मैने कब जाना वो कर भी सकता था

मेहमान बहुत हैं अब घर उस का कब खाली
मुझ को भी कल अपने वो दिल में रखता था

दोराहे पे आकर फिर यूं जुदा भी होना था
मंज़िल थी अलग अलग पर एक ही रस्ता था

ये बात जुदा है कि नज़रें ना मिला पाऊँ
वो दिल में है अब भी जो दिल में रहता था

दिन रात कभी अपने इतने भी सादिक थे
हर पूजा से पहले मेरे आँसू चखता था

पिछले ही बरस शायद हर सावन बीत गया
बरसात में जब छत पर इक चाँद बरसता था

अब देख के भी मुझ को अंजान वो होता है
है कल की बातें वो मिलने को तरसता था

कब अपने रिश्ते को ऐसा भी जाना था
पहली ही बारिश में ये टूट भी सकता था

कुरबत-ओ-दूरी को मैं नाप नही पाया
वो तो हर दिन मुझ से कुछ दूर सरकता था

मेरे कमरे में शब को क्यों आग लगानी थी
मैं खुद इन सपनो से जाग भी सकता था

कभी धूप कभी मुझ को ये बारिश खाती है
कल मुझ को वो अपनी पलकों से ढकता था

मज़बूर तो वो भी है वो घर ही उजाड़ गया
मुझे दिल में रखता था जब दिल वो रखता था

'मासूम' अगर कह दूं कोई कैसे मानेगा
मैं उस का था वो भी मुझे अपना लगता था

1 comment:

Rewa said...

कभी धूप कभी मुझ को ये बारिश खाती है
कल मुझ को वो अपनी पलकों से ढकता था

मज़बूर तो वो भी है वो घर ही उजाड़ गया
मुझे दिल में रखता था जब दिल वो रखता था

superb write.....dil mai tees uthti hai padh kar....