Tuesday, October 11, 2011

दीवारों में इक दर भी हो

दीवारों में इक दर भी हो
चार-दीवारी अब घर भी हो

तुम को शंकर माना क्यों कि
तुम थोड़े से पत्थर भी हो

अंदर अंदर भीगे बरसों
बारिश अब के बाहर भी हो

दिल को हीरा माना तुम ने
क्या जाने ये पत्थर भी हो

दुनिया पर है जादू मेरा
मन ये चाहे तुम पर भी हो

शेर समझ के इस को पढ़ते
क्या जाने ये मंतर भी हो

मुझ में तुम, पर खोज रहा हूँ
शायद मुझ से बाहर भी हो

इस में ही अब वक़्त गुज़रता
अब दफ़्तर में इक घर भी हो

लब पे जो था ग़ज़लों में है
क्या जाने कुछ अंदर भी हो

दुनिया में भी जा कर देखें
कोई तुम सा सुंदर भी हो

दुनिया से मासूम निभाते
कुछ कुछ तो तुम शायर भी हो

Friday, July 29, 2011

आज के लड़के/aaj ke ladke


या तो किसी साइकिल से या नाव पे चढ़के
इसकूल को जाते थे कभी गाँव के लड़के

आज की नसलें तो बस नज़र चुराती हैं
कल मिलते थे बुजुर्गों से वो आप ही बढ़ के

इक भाई के साए में इक भाई जिया था
वो दौर ही ऐसा था पल जाते थे कड्के

विदेशी कोई दफ़्तर अब चाकर इन्हे रख ले
किया खुद को बहुत काबिल रगड़ रगड़ के

काँपते हाथों को नही थामा कभी आ के
सीखे थे कभी चलना यही हाथ पकड़ के

खुद पे खिले फूलों से सारे मारासिम हैं
भूल गये हैं अब वो रिश्ते थे जो जड़ के

जो कुछ भी इन्हे आप अभी दे नही सकते
सब हासिल तो करेंगे कल आप से लड़ के

आवाज़ मेरे दिल की कब शहर में सुनती है
नानी के घर जा कर दिल आज भी धड़ के

थक गये थे जब भी वो तब इस के सहारे थे
दीवार गिरा दी फिर दीवार पे चढ़ के

'मासूम' मनाएंगे ना तुम को कभी आ कर
कुछ भी नही पाओगे तुम इन से बिगड़ के



Monday, June 27, 2011


जब तक साथ रहे सोये थे
इक चादर में हम दोनो,
आज अकेला ही उस को क्यों
इस चादर में लिपटाया है
क्या ये जिस्म पराया है?
मुझ को साँसे सुनती हैं
सब कहते है ये साया है

मेरे लिए मुह खोला है
अभी लगा ये कुछ बोला है
मेरे सपनो ने छेड़ा तो
पलकों को झपकाया है
मुझ को साँसे सुनती हैं
सब कहते है ये साया है



मुझे लिपटाना है इस से अब
दुनिया से शरमाना क्यों
मुझ से अलग किया कैसे और
इस दर्ज़ा बेगाना क्यों
क्यों ऐसे छला हैं मुझ को
क्यों इतना भर्माया है
मुझ को साँसे सुनती हैं
सब कहते है ये साया है



अब किसी की बात नही सुन नी
दुनिया ने ग़लत बताया है
मुझ से बाबस्ता है अब भी वो
मेरे इस जिस्म का साया है
दुनिया पागल कहती है
वो मिट्टी है पराया है
मुझ को साँसे सुनती हैं
सब कहते है ये साया है

Thursday, May 12, 2011

अजीब कशमकश में हूं


रेत का समंदर था
नाव चलाने की कोशिश की
बिना बाज़ुओं की दीवार थी
लिपट जाने की कोशिश की

साँसों में रेत भर गयी
माथे पे चोट है
अब मुझे भी ये लगाने लगा है
मेरी किस्मत में खोट है

प्यार तो मेरा था
तू किस लिए निभाती
प्यास भी मेरी अपनी
बाहों में कैसे आती

अपनी शिकस्त का अब
इल्म हो रहा है
छिप छिप के कही मुझ से
मेरा मन रो रहा है

तेरे शहर में रह के
मन को कहाँ मनाऊँ
खुद से पूछता हूं
दुनिया से क्यों ना जाऊं

कभी नही रहूं तो
मुझ को ना तू भुलाना
चाहता था तुझ को
पागल सा इक दीवाना

अधूरी सी आज मुझ में
मरने की आरज़ू है
मर के तुझे है खोना
और ज़िंदगी में तू है

रेत के समंदर से
गुज़र भी नही सकता
रेत की लहरों में
ठहर भी नही सकता
अजीब कशमकश में हूं
जी भी नही सकता
मर भी नही सकता

orkut - तुझे देख लूं/tujhe dekh loon

orkut - तुझे देख लूं/tujhe dekh loon

hamaraa rishta




















aaj sochatee rahee der tak hamare rishte ko
tum se lamhon men
zindgee bhar ka pyar hona yaad ayaa
meree khushee ke liye
tumhara kuch bhee karane ko tiyar honaa yad yaa
tumharee mujh ko khush rakhane kee koshish
meraa baar baar ronaa yaad ayaa
tumahre seene ko bhigona yaad aya

ab jab bhee sochatee hoon tumhe
ruyaan ruaan pyar se bhartaa hai
hairaan see hotee hoon
koyee mujhe itnaa pyar kartaa hai

is baar jab miloge
is tarah bahon men chipaa loongee
ik umr ka jo fasalaa hai ham men
main fasalaa mitaa loongee
tum bas mujh men khoye rahanaa
meree bahon men soye rahanaa

umr jab barabar ho jayegee
tum ko neend se uthaa loongee
waqt ko bahon men chipaa loongee
akhir maine
umr ko bhulaa ke tum ko pyar kiyaa hai
tum ne bhee bhool ke ki khara hai
meraa har ansu piyaa hai
hamehsaa meraa zakhm siyaa hai
tum ne bhee

Wednesday, May 11, 2011

hamara rishta


















aaj sochatee rahee der tak hamare rishte ko
tum se lamhon men
zindgee bhar ka pyar hona yaad ayaa
meree khushee ke liye
tumhara kuch bhee karane ko taiyar honaa yaad yaa
tumharee mujh ko khush rakhane kee koshish
meraa baar baar ronaa yaad ayaa
tumahre seene ko bhigona yaad aya

ab jab bhee sochatee hoon tumhe
ruaan ruaan pyar se bhartaa hai
hairaan se hotee hoon koyee mujhe
itanaa pyar kartaa hai?

is baar jab miloge is tarah bahon men chipaa loongee
ik umr ka jo fasalaa hai ham men
main fasalaa mitaa loongee
tum bas mujh men khoye rahanaa
meree bahon men soye rahanaa

umr jab barabar ho jayegee
tum ko uthaa loongee
waqt ko bahon men chipaa loongee
akhir maine
umr ko bhulaa ke tum ko pyar kiyaa hai
tum ne bhee bhool ke ki khara hai
meraa har ansu piyaa hai
hamehsaa mraa zakhm siyaa hai
tum ne bhee



Sunday, May 8, 2011

sorry maa



















शुरू में यहाँ पर तू थी या तेरा साया
और फिर कहीं आसमान से मैं आया
सच है कि तब कौन मेरा था?
जहाँ से मैं आया अंधेरा ही अंधेरा था
आँख खोली तो उजाले ही उजाले
उजालों के दरमियाँ थी तू
मैं जानता ही नही था
अब क्या कहूँ अब क्या करूँ?

फिर जब मैने चलना शुरू किया
वक़्त ने करवट बदलना शुरू किया
मैं अब तक भी कौन था
या तुतलाता था बस या मौन था
तेरे सिवा कौन पहचनाता था
तेरे सिवा किस से पहचान थी
ऐसा लगा था जैसे अब भी मैं तुझ में था
तुझ में ही मेरी जान थी
तू मुझे हँसाती तू मुझे रूलाती
अंगुली पकड़ कर स्कूल छोड़ने जाती

तुझ से पहचान थी पर तुझे जान नही पाया
बार बार यही सवाल ज़हन में आया
सच में यही सवाल कि तू सब कुछ क्यों करती है?
किस के लिए जीती है किस के लिए मरती है?
तूने मुझ में ऐसा क्या पाया?
मां मुझे कभी भी समझ नही आया

तेरे सिवा घर के लिए कोई भी
इतनी कुर्बानी नही करता था
मैं पत्थर की तरह सोचता रहता
पर आँखों में पानी नही भरता था
मेरे जैसे छोटे से बच्चे के लिए
इतने बड़े बड़े काम?
ना कोई कीमत ना ही ईनाम?

धीरे धीरे मैं अच्छा दिखने लगा
अच्छा पढ़ने लगा अच्छा लिखने लगा
बस तेरी वजह से तेरी मेहनत से
मैने क्या क्या नही पाया
पाया था तेरी सोहबत से
मेरे हर अच्छे काम पर ईनाम आने लगा
मैं खुद को बड़ा कहने लगा
और मेरी नज़र में
तुझ से पहले मेरा नाम आने लगा
और तुझ को मैं भुलाने लगा
तेरी कुर्बानी धुंधला गयी
तू निकल गयी मुझे में से
मेरी अपनी ही रूह आ गयी
मेरे अंदर मंदिर मिट रहा था
बस मेरे अंदर मेरा अपना ही घर हो रहा था
तूने मुझे क्या बनाया था
और मैं एक जानवर हो रहा था
पर आज मुझे मेरा इंसान लौटाना है
मां मुझे फिर तेरे पास आना है

सब तेरे कारण है अब ये बताना है
कितनी बार तेरा मैने अपमान किया
लोगों ने देखा भी तूने कहाँ ध्यान दिया
कितना बुरा बन के मैं पेश आता था
मैं परेशान हूं
तेरा मन बस यही खुद को यही समझाता था
और सब भूल जाता था
मैं बौना हूं खुद को समझाना होगा
मा तुझे देखेने के लिए
हर बार ये सर ऊपर उठाना होगा

मेरे उस ज़हीन होने को भुला दे माँ
इस बुद्धू बच्चे को गले से लगा के रुला दे माँ
अगर मैं ज़रा सा भी दुनिया को जानता हूं
उस का सबब मैं अब तुझ को ही मानता हूं
तेरे पुराने लफ्ज़ मेरे नये दर्द को सहलाते हैं
और अपना किया याद आने से आँसू बहते जाते हैं

मेरे ये गीत सुन ले माँ मेरी तुतलाती आवाज़ सुन ले
मैने लिख डाली है इक आरती तुझ पे वो आज सुन ले
आज तन का नही मन का सारा मैल भी चुन ले
तू जिस ने मेरा मैल भी हंस के साफ किया
हंस के ना सही रो के कह दे ना कि जा तुझे माफ़ किया
कह दे ना मुझे माफ़ किया
पर तेरे लायक तो मेरी ये फरियाद भी नही है
मैंने क्या क्या बुरा किया तुझे तो
इतना अब याद भी नही है

Saturday, May 7, 2011
























ज़ख़्मों पर मैं अक्सर बस आग छिडकता था
इक राख नतीज़ा है अंगारे लिखता था

क्या करूँ तुम्हारा मैं वो बोलता रहता था
तब मैने कब जाना वो कर भी सकता था

मेहमान बहुत हैं अब घर उस का कब खाली
मुझ को भी कल अपने वो दिल में रखता था

दोराहे पे आकर फिर यूं जुदा भी होना था
मंज़िल थी अलग अलग पर एक ही रस्ता था

ये बात जुदा है कि नज़रें ना मिला पाऊँ
वो दिल में है अब भी जो दिल में रहता था

दिन रात कभी अपने इतने भी सादिक थे
हर पूजा से पहले मेरे आँसू चखता था

पिछले ही बरस शायद हर सावन बीत गया
बरसात में जब छत पर इक चाँद बरसता था

अब देख के भी मुझ को अंजान वो होता है
है कल की बातें वो मिलने को तरसता था

कब अपने रिश्ते को ऐसा भी जाना था
पहली ही बारिश में ये टूट भी सकता था

कुरबत-ओ-दूरी को मैं नाप नही पाया
वो तो हर दिन मुझ से कुछ दूर सरकता था

मेरे कमरे में शब को क्यों आग लगानी थी
मैं खुद इन सपनो से जाग भी सकता था

कभी धूप कभी मुझ को ये बारिश खाती है
कल मुझ को वो अपनी पलकों से ढकता था

मज़बूर तो वो भी है वो घर ही उजाड़ गया
मुझे दिल में रखता था जब दिल वो रखता था

'मासूम' अगर कह दूं कोई कैसे मानेगा
मैं उस का था वो भी मुझे अपना लगता था

क्या ग़लत है कि मैने........


हदें भी बनती रही
क़ैदखाने खड़ी करती रही
चारदीवारी माँग ली
जिस की कमज़ोर कोई दीवार नही हो
डरती थी कि बाहर ना निकल जाऊं
कहीं मुझ को किसी प्यार नही हो

तुम जानते थे मैं बहुत सख़्त हूं
पर ये भी जानते थे सख्ती बर्फ सी है
पिघल जाऊंगी
तुम्हे अपने सांचों पे एतबार था
इल्म था की इस में ही ढल जाऊंगी

तुम जब भी आते रात में आते
जब मैं नींद में सोती रहती थी
मैं खुद से कहीं दूर हो जाती उस पल
खुद से ही बिछुड़ के रोती रहती थी

तुम एक दिन मुझे "पर" दे कर चले गये
मुझे परी बना दिया
तुम जानते थे दीवार नही तोड़ सकती मैं कभी
तुम ने मुझे उड़ाना ही सिखा दिया

चार दीवारी बिना छत की थी
मैं उड़ के तुम्हारी बाहों में भर गयी
मैने चाहा था मुहब्बत ना करूँ तुम से
मैं खुद से भी उस रात बग़ावत कर गयी

कितना दुश्वार था तुम से प्यार करना
मगर कितना आसान हो गया
मैने हर ज़मीन से दूर हो गयी
मेरा घर ये आसमान हो गया

होना ही था मैने एक चाँद को चाहा था
और प्यार में महबूब के घर जाने का रिवाज़ है
मैं खुद को किसी आवाज़ से नही रोक पाती हूँ
मेरे दिल का इस दर्ज़ा बेबस सा अंदाज़ है

अब खुद से पूछती रहती हूं
क्या ग़लत है कि मैने तारों को वस्ल का गवाह किया है
आज सच सच बता दे मुझे में ही रहने वाली
मैने प्यार किया है की गुनाह किया है